IS को बर्बाद करने के लिए ईरान से 35 साल पुरानी दुश्मनी भूलाया अमेरिका

By: | Last Updated: Thursday, 16 July 2015 6:40 AM
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नई दिल्ली: ईरान अमेरिका को सबक सिखाना चाहता था और अमेरिका ने ईरान को पाबंदियों की सजा भी सुनाई. ये सब कुछ उन 35 सालों में हुआ जब अमेरिका और ईरान एक दूसरे को फूटी आंख से भी नहीं देखना चाहते थे. बिना इस इतिहास को जाने ईरान से हुए नए समझौते की अहमियत समझना नामुमकिन है.

 

अब से तीन साल पहले यानी साल 2012 में उस दौर के ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया था. ये तस्वीर ईरान के स्टेट टेलिविजन पर प्रसारित हुई थी जिसमें ईरान के राष्ट्रपति एक परमाणु संयत्र में मौजूद थे और दावा कर रहे थे कि ईरान ने परमाणु हथियार बनाने में महारत हासिल कर ली है.

 

ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाकर आर्थिक और कारोबारी घेराबंदी करने वाले अमेरिका के लिए ये ईरान की खुली चुनौती थी. आखिर ईरान ऐसा क्यों कर रहा था?

 

जवाब जानने के लिए पैंतीस साल पहले उस दौर में चलना होगा जब ईरान में मोहम्मद शाह रेजा पेहलवी का शासन था. और शाह के दोस्त हुआ करते थे अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर . शाह अमेरिका के साथ मिलकर ईरान को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने की कोशिश कर रहे थे. ईरान और अमेरिका की ये दोस्ती अचानक टूट गई. वजह थी 1979 की ईरानी क्रांति.

 

इस क्रांति में पूरा ईरान शामिल था और उसके नेता थे अयातुल्लाह खोमैनी जो शाह के विरोधी थे और पेरिस में निर्वासित जिंदगी बिता रहे थे. आखिरकार शाह को ईरान छोड़कर भागना पड़ा और दो हफ्ते बाद फरवरी 1979 में खोमेनी तेहरान आ गए एक हीरो की तरह.

 

अयातुल्लाह खोमेनी का असर ईरान पर बढ़ने लगा और उन्होंने अमेरिका को अपना नया दुश्मन घोषित कर दिया. अयातुल्लाह खोमेनी ने कहा, ‘जिन्हें लगता है पश्चिम में कोई बात है तो उन्हें जान लेना चाहिए कि पश्चिम सिर्फ नीच है.’

 

असर दिखाई देने लगा

खोमैनी की वापसी के महज 9 महीने बाद हजारों छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को तबाह कर दिया और 63 अमेरिकियों को बंधक बना लिया. ये अमेरिका को नए ईरान की पहली चुनौती थी. अगर वो सेना का हमला करते हैं तो हमें फर्क नहीं पड़ता, फर्क इस बात से पड़ता है कि ईरान में उनकी नीच मानसिकता ना आ जाए.

 

अयातुल्लाह खमेनी साल 1989 तक ईरान की सत्ता पर काबिज रहे लेकिन उनके बाद सत्ता में आए अली खमेनी की विचारधारा भी अलग नहीं थी. हालात और बिगड़ गए जब अली खमेनी की अगुवाई में ईरान ने आतंकी संगठनों को हथियार और पैसे से मदद करनी शुरू कर दी. दावा किया जाता है कि उसी दौर में ईरान ने अपना खुफिया परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू कर दिया था.

 

तब तक अमेरिका ने इसके खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी. यही नहीं ईरान के बच्चे बच्चे के हाथ में हथियार थमा दिए गए और धमकी दी गई कि अमेरिका जंग छेड़ता है तो ईरान पीछे नहीं हटेगा. इसी तनाव के बीच साल 2005 में अहमदेनिजाद ने ईरान की सत्ता संभाली लेकिन खमेनी ही सर्वेसर्वा थे.

 

IS को बर्बाद करने के लिए ईरान से 35 साल पुरानी दुश्मनी भूलाया अमेरिका 

साल 2002 से साल 2012 तक अमेरिका बार बार परमाणु हथियारों का सवाल उठाता रहा और संयुक्त राष्ट्र ने इरान पर कारोबारी प्रतिबंध लगा दिए. ईरान की हालात बिगड़ी लेकिन अहमदीनेजाद का रुख नहीं बदला. इसी रुख के चलते अहमदीनेजाद ने साल 2012 में ईरान के राष्ट्रीय टीवी चैनल पर परमाणु बम बनाने का दावा कर दिया.

 

पाबंदियां और कड़ी कर दी गई थीं. आखिरकार साल 2013 ने अतंराष्ट्रीय पाबंदी की मार से परेशान ईरानी जनता ने सत्ता हसन रूहानी को सौंप दी.

 

अब हसन रुहानी की अगुवाई में ही ईरान ने परमाणु कार्यक्रम की जिद छोड़ दी है और माना जा रहा है इसका असर अब एक नई राजनीति में दिखाई देगा. ईरान और अमेरिका दोनों की दुश्मनी सुन्नी आतंकवादी संगठन आईएस से है और ऐसे में दुश्मन के दुश्मन दोस्त भी बन सकते हैं.

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