मैराथन बातचीत के बात हुआ जलवायु समझौता और भारत की चिंताओं का समाधान

By: | Last Updated: Sunday, 14 December 2014 1:21 PM
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लीमा: संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में वार्ताकारों ने आज वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के राष्ट्रीय संकल्पों के लिए आम सहमति वाला प्रारूप स्वीकार कर लिया जिसमें भारत की सभी चिंताओं का समाधान किया गया है. इससे अब जलवायु पर्वितन से निपटने के मुद्दे पर अगले साल पेरिस में नए महत्वाकांक्षी एवं बाध्यकारी करार पर हस्ताक्षर के लिए मार्ग प्रशस्त हो गया .

 

संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन की तकरीबन दो हफ्ते चली बातचीत के बाद वार्ता के अध्यक्ष एवं पेरू के पर्यावरण मंत्री मैनुएल पुलगर-विदाल ने घोषणा की, ‘‘दस्तावेज स्वीकार हुआ .’’उन्होंने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि यह अच्छा है और मैं समझता हूं कि इससे हम आगे बढ़ेंगे .’’

 

भारत की चिंता –

 

मसौदे पर टिप्पणी करते हुए भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा, ‘‘भारत की सभी चिंताओं का समाधान कर दिया गया है .’’ जावड़ेकर ने कहा, ‘‘यहां हमने लक्ष्य प्राप्त कर लिया और हमने वह पाया जो हम चाहते थे .’’ उन्होंने यह टिप्पणी 2015 के करार के लिए वार्ता का व्यापक खाका मंजूर होने के बाद की . करार 2020 में प्रभावी होगा .

 

वह अगले साल होने वाली बैठकों और पेरिस में होने वाले सम्मेलन के प्रति सकारात्मक दिखे और कहा, ‘‘हम इस पर (लीमा दस्तावेज) आम सहमति कायम कर सकते हैं .’’ मसौदे की मंजूरी को पेरिस में वैश्विक जलवायु परिवर्तन करार तक पहुंचने की दिशा में एक उल्लेखनीय पहले कदम के रूप में देखा जा रहा है . बहरहाल, प्रतिनिधियों का कहना है कि ज्यादातर कठोर काम अभी बाकी है .

 

इस करार को ‘जलवायु कार्रवाई के लीमा आह्वान’ का नाम दिया गया है और यह पर्यावरण के इतिहास में एक ऐतिहासिक समझौते के रूप में देखा जा रहा है.

 

विकासशील देशों द्वारा एक पिछला मसौदा खारिज किए जाने के कुछ घंटों बाद इस समझौते को स्वीकार किया गया. विकासशील देशों का आरोप था कि अमीर देश वैश्विक ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले की अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि विकसित देश इसके प्रभावों की कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें .अंतिम मसौदे के बारे में कहा जा रहा है कि उसने विकासशील देशों की चिंताओं का समाधान कर दिया. रविवार को तड़के जब यह घोषणा की गई तो प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने राहत की सांस ली. हालांकि, पर्यावरण समूहों ने समझौते को कमजोर और निष्प्रभावी करार देते हुए कहा कि इससे अंतरराष्ट्रीय जलवायु नियम-कायदे कमजोर होंगे.

 

कार्बन उत्सर्जन में कटौती के संकल्प के भार को बांटने के मुद्दे पर अमीर और गरीब देशों के बीच मतभेद की वजह से यह बातचीत काफी मुश्किल साबित हुई.

 

मसौदे में सिर्फ इस बात का जिक्र किया गया कि 2015 के दिसंबर में पेरिस में होने वाले सम्मेलन से एक महीना पहले सभी संकल्पों की समीक्षा की जाएगी ताकि जलवायु परिवर्तन पर उनके संयुक्त प्रभाव का आकलन किया जा सके.

 

तीन प्रमुख पहलू –

 

‘यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑफ क्लाइमेट चेंज’ की कार्यपालक सचिव क्रिस्टीना फिगरेस ने संवाददाताओं को बताया कि मंजूर किया गया मसौदा तीन प्रमुख पहलुओं – विज्ञान, नीतिगत प्रक्रिया एवं कार्रवाई – के बीच की खाई को पाटने की दिशा में प्रगति है. फिगरेस ने ‘हरित जलवायु कोष’ को बढ़ाकर लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर किए जाने के प्रति नए संकल्पों की तारीफ की . जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में विकासशील देशों की सहायता के लिए ‘हरित जलवायु कोष’ की स्थापना की गई थी.

 

इससे पहले, पुलगर-विदाल ने पूरा दिन प्रतिनिधियों से अलग अलग विमर्श करने में बिताया था. उन्होंने मध्यरात्रि से बस थोड़ा ही पहले यह कहते हुए एक नया मजमून पेश किया कि ‘‘किसी मजमून के रूप में यह आदर्श नहीं है, लेकिन इसमें पक्षों का रूख शामिल है .’’वार्ताकारों को संशोधित मसौदा मजमून की समीक्षा के लिए एक घंटा दिया गया . संशोधित मजमून में ‘‘नुकसान एवं क्षति’’ के प्रावधान के संबंध में प्रस्तावना में एक लाइन जोड़ी गई है . छोटे विकासशील द्वीप देशों ने इसका आग्रह किया था . मुख्य पूर्ण सत्र स्थानीय समयानुसार डेढ़ बजे रात दोबारा किया गया और पुलगर-विदाल ने घोषणा की कि मसौदा मजमून स्वीकार कर लिया गया है .

 

भारत और अन्य विकासशील देशों के रूख के अनुरूप विभेदीकरण : जलवायु कार्रवाई उपायों के लिए अदायगी करने की उनकी क्षमता के आधार पर देशों को श्रेणीबद्ध करने के उसूल के बारे में अलग से एक पैराग्राफ जोड़ा गया है .

 

इसमें कहा गया है कि पेरिस 2015 करार को ‘‘भिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में साझी लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमता के उसूल’’ प्रतिबिंबित करना चाहिए .

 

आखिरी हिस्सा इस साल नवंबर में घोषित अमेरिका चीन जलवायु समझौता से सीधे उठा लिया गया . पुलगर-विदाल ने कहा, ‘‘मैं समझता हूं कि यह अच्छा है, और मैं समझता हूं कि यह हमें आगे बढ़ाता है.’’ यह पहला मौका है जब उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ चुका चीन, भारत, ब्राजील और उभरती हुई अन्य अर्थव्यवस्थाएं अपने उत्सर्जन में कटौती करने पर सहमत हुए हैं .

 

अब जो सहमति बनी है, उसके अनुसार ,देश अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्य पेश करेंगे जिसकी समयसीमा अगले साल 31 मार्च होगी .

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