जिस बेटी को भारत जीने का हक नहीं देता, उसी बेटी के लिए 3 लाख करोड़ दान देंगे मार्क जकरबर्ग

By: | Last Updated: Wednesday, 2 December 2015 4:24 PM
Mark Zuckerberg Vows to Donate 99% of His Facebook Shares for Charity

नई दिल्ली : फेसबुक के मालिक मार्क जकरबर्ग ने बेटी होने की खुशी में अपनी दौलत दान करने का फैसला किया है. महज़ तीस साल की उम्र में मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक में अपने हिस्से का 99 फीसदी दान करने जा रहे हैं. रकम सुनकर आप दंग रह जाएंगे. 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होगा मार्क जकरबर्ग का दान.

 

खास बात ये है कि रकम जितनी बड़ी है जज्बा उससे कहीं ज्यादा बड़ा है. इस फैसले के पीछे है उनकी बेटी, ठीक वैसी ही एक बेटी जिसे बराबरी से जीने का हक तो दूर जीने का हक भी नहीं दे पाता है भारत.

 

आपको बता दें कि मार्क जकरबर्ग की जिंदगी में भी खुशी का एक लम्हा आया है. अभी पंद्रह दिन भी नहीं हुए हैं जब उनकी जिंदगी में आई है एक बेटी जिसका नाम रखा गया है मैक्स.

 

नन्हीं मैक्स ने अपने पिता मार्क और मां प्रिशिला चान को जिंदगी का नया मकसद भी दे दिया है और उनके वजूद को नई पहचान भी. पिछले 9 साल से फेसबुक की अपनी दुनिया को कॉलेज हॉस्टल से निकालकर देश-दुनिया तक पहुंचाने और अपने कारोबार को बुलंदियों पर ले जाने में जुटे मार्क जकरबर्ग ने बेशुमार दौलत कमाई लेकिन बेटी मैक्स के आते ही मार्क जुकरबर्ग ने अपनी दौलत बेटी को एक बेहतर दुनिया देने के लिए दान देने का फैसला किया है.

 

मार्क जुकरबर्ग और उनकी पत्नी प्रिशिला चान फेसबुक में अपनी हिस्सेदारी का 99 फीसदी दान देने जा रहे हैं.

 

इस वक्त फेसबुक के मालिक मार्क जकरबर्ग के पास अपनी संपत्ति है 3,11,781 करोड़ रुपये, बेटी मैक्स के जन्म के बाद अब वो इसमें से 3,08,663 करोड़ रुपये दान देने जा रहे हैं. यानी अब बेटी मैक्स, पत्नी चान और मार्क जकरबर्ग के हिस्से में अब सिर्फ 3117 करोड़ ही रह जाएंगे.

फेसबुक के प्रोडक्ट लांच की तरह ये फैसला ना तो किसी बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुनाया गया ना ही किसी इंटरव्यू में, बल्कि जकरबर्ग ने अपने फेसबुक पेज पर इस तस्वीर के साथ अपनी बेटी मैक्स को लिखे एक लंबे खत में किया है ये वादा.

अपनी बेटी के लिए मार्क जकरबर्ग के जज्बात को बयां करती इस चिट्ठी में लिखा है.

 

प्यारी मैक्स,

 

तुम्हारी मां और मेरे पास शब्द नहीं हैं जो बता सकें कि तुमने हमें आने वाले कल के लिए उम्मीदों से भर दिया है. तुम्हारी नई जिंदगी वादों से भरी है और हमें उम्मीद है कि तुम खुश और सेहतमंद रहो ताकि तुम इसे पूरी तरह जी सको. तुमने हमें एक वजह दी है ताकि हम उस दुनिया के लिए कुछ कर सकें जिसमें तुम्हें जीना है. हर माता-पिता की तरह हम तुम्हें उस दुनिया में पलते-बढ़ते देखना चाहते हैं जो हमारी दुनिया से बेहतर हो.

 

अपनी बेटी के लिए एक नई और बेहतर दुनिया बनाने के इसी मकसद का खुला बयान है मार्क जकरबर्ग का अपनी बेटी मैक्स के नाम लिखा गया खत. इस खत में बेटे और बेटी के बीच समानता, स्वास्थ्य और इंटरनेट सेवा और शिक्षा के लिए अपनी संपत्ति दान करने की बात कही है. बड़ी बात ये है कि मार्क जकरबर्ग का ये फैसला एक बेटी के लिए है जिन्हें हमारे देश में बराबरी का दर्जा तक हासिल नहीं है.

 

मार्क जकरबर्ग ने अपनी बेटी मैक्स को लिखे खत में जाति रंग और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ काम करने का वादा किया है ताकि मैक्स और उसकी पीढ़ी के बच्चों को बराबरी का हक मिल सके.

 

जकरबर्ग ने आगे लिखा:-

 

प्यारी मैक्स,

 

हम दुनिया को बदलने में अपनी भूमिका निभाने जा रहे हैं सिर्फ इसलिए नहीं कि तुम हमारे दिल का टुकड़ा हो बल्कि इसलिए भी क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी के हर बच्चे के लिए ये हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है. हमारा विश्वास उन सबकी समानता में है जो सिर्फ इस दौर में ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों का हिस्सा बनेंगे. हमारी सारी उम्मीद सिर्फ दो बातों पर टिकी है– इंसान की क्षमताओं पर भरोसा और समाज में समानता का बर्ताव. समाज में समानता होगी तभी इंसान उन मौकों तक पहुंच पाएगा, जहां वो अपनी क्षमता का इस्तेमाल कर सके.

 

मार्क जकरबर्ग की दुनिया फेसबुक का दफ्तर है तो मां प्रिशिला चान एक बाल रोग विशेषज्ञ हैं. दोनों अपनी बेटी से किए वादे के मुताबिक इस साल 11 हजार करोड़ रुपये सामाजिक कामों के लिए दान देंगे. ये सिलसिला साल दर साल आगे बढ़ता जाएगा.

 

और भी हैं दानी

 

इससे पहले माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स और उनकी पत्नी मिलिंडा गेट्स ने अपनी संपत्ति का 95 फीसदी यानी करीब 19 हजार करोड़ रुपये दान दे चुके हैं. दुनिया के तीसरे सबसे अमीर शख्स और निवेशक वारेन बफेट भी 11 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति दान कर चुके हैं.

 

लेकिन इस बार बात सिर्फ दान की नहीं है, बात बेटी की है और उसके जन्म की खुशी में मार्क जकरबर्ग के फैसले की है.

 

मार्क जकरबर्ग 3 लाख करोड़ के इस बड़े दान से क्या करेंगे, इस सवाल का जवाब भी मार्क जकरबर्ग ने अपनी बेटी मैक्स को ही दिया है, लेकिन खत के आखिर में उन्होंने ये भी लिखा है कि पूरी योजना का ब्लूप्रिंट वो तब तैयार करेंगे जब वो दोनों यानी मार्क जकरबर्ग और चान बेटी के जन्म की खुशियां मनाकर दफ्तर लौटेंगे.

 

क्या भारत में कोई ऐसा कर सकता है?

 

मार्क जकरबर्ग और प्रिशिला चान अपनी बेटी के लिए दुनिया को बदलने की कसम उठा पाते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अमेरिका में रहते हैं. क्या भारत में भी बेटियों को इतना प्यार और सम्मान मिलना मुमकिन है.

 

लैंगिक समानता यानी जेंडर इक्वैलिटी पर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की साल 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका उन पहले 20 देशों में शामिल है जहां लड़के और लड़की के बीच भेदभाव नहीं किया जाता, लेकिन भारत लैंगिक समानता के आधार पर बनाई गई 136 देशों की लिस्ट में 114 वें नंबर पर है.

 

इस आंकड़े का सिर्फ एक मतलब है, लड़कियों को बराबरी का दर्जा नहीं देता हमारा और आपका देश. लेकिन बराबरी की बात तो छोड़िए,  जीने का हक तक नहीं दिया जाता. गर्भ में मार जाती हैं बेटियां.

 

ये देश में बेटियों का हाल

 

ओडिशा के नयागढ़ जिले का वो कुआं आपको याद होगा, जहां से नवजात बच्चियों की चीखें आती हैं. उस कुएं में साल 2007 में एक दो नहीं एक साथ 60 नवजात बच्चियों के अवशेष बरामद हुए थे और देश की रूह कांप गई थी लेकिन उस घटना के 8 साल बाद भी ना तो किसी गुनहगार का पता चला और ना किसी को सजा मिली.

 

ओडिशा ही नहीं देश के तमाम हिस्सों में जन्म लेते ही बेटियों का मार देने की प्रथा प्रचलित है. हरियाणा, राजस्थान और दक्षिण भारत तक ये गुनाह किसी परंपरा की तरह निभाया जा रहा है. कानून हैं, सरकार के अभियान हैं लेकिन हालात नहीं सुधरते. मार्क जुकरबर्ग अपनी बेटी को अपनी जिंदगी का मकसद कहते हैं लेकिन भारत में बेटियां मकसद नहीं मुसीबत मानी जाती हैं.

 

प्रधानमंत्री ने खुद बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजना शुरू करते हुए देश को ये संदेशा दिया था. लेकिन सवा अरब के देश के प्रधानमंत्री को ऐसा क्यों करना पड़ा.

 

कितनी बेटियां गर्भ में मार दी जाती हैं

 

आंकड़े बताते हैं कि देश में हर रोज करीब दो हजार बच्चियों को गर्भ में ही मिटा दिया जाता है, यानी हर साल 5 लाख बेटियों की जन्म लेने से पहले हत्या कर देता है हमारा समाज. पिछले 20 साल में 1 करोड़ बेटियों का कोख में ही कत्ल किया जा चुका है. इसी का नतीजा है कि साल 2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक देश में 6 साल तक के 1000 बच्चों पर केवल 914 बच्चियां बची हैं.

 

बच्चियों को बचाने की मुहिम हमारे देश का सच भी है और मजबूरी भी. लेकिन ऐसे विज्ञापनों के बावजूद हालात सुधरने की बजाए बिगड़ते जा रहे हैं. देश के महिला और विकास मंत्रालय के इन आंकड़ों की जुबानी हमारे समाज की बेटियों की ये कहानी भी जानिए.

 

साल 1981 की जनगणना के मुताबिक में 6 साल की उम्र तक के 1000 लड़कों के मुकाबले 962 लड़कियां थीं, लेकिन 1991 की जनगणना में 1000 बेटों के मुकाबले बेटियों की संख्या सिर्फ 945 रह गई. और साल 2001 में तो ये आंकड़ा प्रति 1000 बेटों पर 927 बेटियों तक सिमट चुका है. देश के 328 जिलों में 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 950 से कम है.

 

बच्चियों को कम उम्र में मारने का ही नतीजा है कि देश में 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 940 हो गई. इसे रोकने के लिए गर्भ में बच्चों के लिंग की जांच को साल 1995 में ही गैरकानूनी बना दिया गया था लेकिन 20 साल बाद भी बड़ा असर नजर नहीं आता. यही नहीं जो बच्चियां जीने का मौका पा जाती हैं वो भी बराबरी की जिंदगी जी पाएं ऐसा नहीं है.

 

दरअसल इसकी बड़ी वजह है भारत की दहेज प्रथा. बेटी के जन्म का मतलब है शादी पर भारी भरकम खर्च. दहेज विरोधी कानून भी इस प्रथा को कम नहीं कर पा रहे और ऐसे में लड़की को बोझ मानकर मिटा देने का चलन भी थम नहीं पा रहा. ऐसे में क्या ये मुमकिन है कि कोई मार्क जकरबर्ग किसी मैक्स को दुनिया की बेहतरी का दूत बना पाए.

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