पाकिस्तान: तीन दशकों से गरीब बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं मोहम्मद अयूब

By: | Last Updated: Monday, 23 March 2015 7:25 AM

नई दिल्ली: पाकिस्तान के रहने वाले 57 साल के मोहम्मद अयूब उन बच्चों के लिए मसीहा साबित हो रहे हैं जिनके पास शिक्षा के लिए ना तो पैसे हैं और ना ही पर्याप्त साधन. मोहम्मद अयूब गरीब तबके के बच्चों को फ्री में पढाते हैं और यह काम वे पिछले तीन दशकों से कर रहे हैं.

 

मोहम्मद अयूब कहते हैं, ‘सच में मुझे नहीं पता कि कितनों ने यहां से पढ़ाई की है. उनकी संख्या हजारों में होगी. इसके लिए मिस्टर अयूब को लाहौर में एक समारोह में सम्मानित किया गया. इसके बाद अयूब ने कहा कि वे मरते दम तक इस मिशन को जारी रखेंगे.

मोहम्मद अयूब पाकिस्तान में सरकारी कर्मचारी हैं. अयूब अपने पिता की मौत के बाद 1976 में अपने सात भाइयों बहनों की जीविका चलाने के लिए इस्लामाबाद आए थे. संयोग से उन्हें यहां पर नौकरी मिल गई. अयूब ने बहुत ही मेहनत से प्राथमिक चिकित्सा के गुण और फायरमैन का काम सीखा. उन्होंने बम को डिफ्यूज करना भी सीखा और अंत में अग्निशमन कर्मचारी के रूप में इनका प्रमोशन हुआ.

 

अयूब बताते हैं कि 1985 में एक दिन उन्होंने एक रेस्टोरेंट में 12 साल के बच्चे को टेबल साफ करते हुए देखा और यही पर उन्हें एक आइडिया आया जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. मुझे  लगा कि मेरे भाई और उसमें कुछ फर्क नहीं है और मैंने उसे पढ़ाने का निर्णय लिया. यही से मेरे ओपेन स्कूल मिशन की शुरूआत हुई.

इसके बाद अयूब ने दुकान और रेस्टोरेंट में काम करने वाले बच्चों के एक से दो घंटे तक पढाई करने के लिए प्रेरित किया. कई जगह इधर उधर पढा़ने के बाद फाइनली कोहसार मार्केट के पास एक खुले मैदान में बच्चों को पढा़ना शुरू किया ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पढ़ सकें.

 

इसके बाद अयूब छात्रों के बीच से लीजेंड बनकर उभरे. उनके इस समर्पण को देखकर प्रधानमंत्री के सीनियर एडवाइजर इरफान सिद्दीकी ने उन्हें प्राइड ऑफ परफार्मेंस अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया.

 

अयूब के ही एक पूर्व छात्र फरहात अब्बास याद जो अब अयूब की तरह ही बच्चों को पढ़ाते है, याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें वो  समय भी याद है जब मिस्टर अयूब अपने परिवार के पालन-पोषण और अध्यापन के लिए लड़की काटते थे.

 

अब्बास कहते हैं, ‘मैं उनकी तरह ही अध्यापक बनना चाहता था और बना. अगर मैं उनसे नहीं मिलता तो अनपढ़ ही रह जाता.’

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Web Title: On a mission to teach the underprivileged
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