टाइपराइटर बेचने वाला कैसे बना डायरेक्टर?

By: admin | Last Updated: Saturday, 20 December 2014 3:46 PM
टाइपराइटर बेचने वाला कैसे बना डायरेक्टर?

ये दास्तान एक छोटे से टाइपिंग इंस्टीट्यूट से शुरु होती है और वक्त के कंधों पर सवार होकर जब सिनेमा के संसार में पहुंचती है तो खुद कामयाबी का इंस्टीट्यूट बन जाती है. ये एक छोटे शहर में पलने वाले उस सुनहरे सपने की कहानी है जिसमें मौज मस्ती के रंग हैं तो संघर्ष के दंश भी शामिल रहे हैं. नारंगी के लिए मशहूर मध्य भारत के शहर नागपुर में करीब 35 साल पहले एक लड़के राजू ने भी सतरंगी सपने देखे थे. राजू सपनों का सौदागर बनना चाहता था. वह बॉलीवुड की रुपहली दुनिया में ऊंची उड़ान भरना चाहता था. वह फिल्मों में बनना चाहता था हीरो. लेकिन किस्मत के खेल ने उसे बना दिया था जीरो. लेकिन राजू का ये सपना रात की नींद वाला सपना नहीं था बल्कि ये वह सपना था जो उसने अपने कॉलेज के दिनों में जागती आखों से देखा था. इसीलिए एक छोटे से टाइपिंग इंस्टीट्यूट का वह टाइपराइटर लड़का आज बॉलीवुड का सबसे कामयाब फिल्म डॉयरेक्टर बन चुका है.

 

चलिए हम आपको बताते हैं कि कैसे एक टाइप-राइटर से हिंदी सिनेमा के सबसे कामयाब डायरेक्टर बन गए राजू हिरानी. साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि सिनेमा की दुनिया में कामयाबी कैसे खेलती है सपनों के साथ आंख मिचौली. आखिर क्यों मुंबई नगरिया को कहा जाता है मायानगरी.

 

कहा जाता है कि बॉलीवुड की दुनिया में हर शुक्रवार को बादशाह बदल जाता है. क्योंकि इसी दिन फिल्में रिलीज होती हैं और अपने अंजाम तक पहुंचती भी है. लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मी किरदार ऐसे भी हैं जिन्हें पीढियों के फासले भी भुला नहीं सके हैं और ऐसे ही चंद किरदारों में शामिल हैं मुन्नाभाई. फिल्मी परदे पर संजय दत्त यानी मुन्नाभाई को आपने जादू की झप्पी देते हुए देखा होगा लेकिन इस किरदार को रचने वाले चेहरे को कम ही लोग पहचानते हैं और वह चेहरा है राजू हिरानी. फिल्म निर्देशक राजू हिरानी ने अपने करियर में अभी तक सिर्फ इन तीन फिल्मों का ही निर्देशन किया है. लेकिन मुन्ना और सर्किट से लेकर रैंचों तक उनके किरदारों की कामयाबी ने उन्हें आज बॉलीवुड का सबसे बिकाऊ निर्देशक बना दिया है. और परदे पर अब राजू के उस सपने की बारी है जिसे उन्होंने नाम दिया है पीके.

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि जो पीके है वह मेरे लिए सपना था कि इस सबजेक्ट पर फिल्म बनानी. अगर आप थ्री ईडियट को देखे तो उसकी थीम थी कि सकसेस के पीछे ना भागो. एक सेंस के पीछे भागिए तो सकसेस अपने आप मिल जाएगी. अगर आपको बाल काटने में मजा आता है तो आप बाल काटिए क्योंकि आप इतने अच्छे बाल काटोगे कि सब आएगे. इस फिल्म का थीम में बता नही सकता हूं पर सालों से मन में था कि इस थीम पर फिल्म बनाऊंगा.

 

जैसा कि राजू खुद कहते है कि फिल्म पीके उनका सपना है लेकिन राजू हिरानी का ये सपना नींद वाला सपना नहीं है बल्कि ये वह सपना है जिसे उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में जागती आंखों से देखा था.

 

अस्सी के दशक का ये वह दौर था जब नागपुर के इसी हिस्लॉप कॉलेज में राजू हिरानी बीकॉम की पढ़ाई कर रहे थे. एक मध्यवर्गीय परिवार की तरह राजू हिरानी के मां- बाप भी उन्हें इंजीनियर या डॉक्टर बनाने का सपना संजोए हुए थे लेकिन जब हायर सेकेंडरी में राज हिरानी के मार्क्स अच्छे नहीं आए तो उन्हें हार कर कॉमर्स के कोर्स में ही एडमिशन लेना पड़ा था.

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि क्लासेस होती थी सुबह 7 से 10.30 बजे तक. वह भी आधे लोग अटैंड नहीं किया करते थे. दिन भर खाली होता था उस दौरान मेरी मुलाकात नागपुर में कुछ लोगों से हुई जो थियेटर या प्ले किया करते थे. तो मैने वह करने शुरु किए और उसमें इच्छा कुछ ज्यादा जागा, तो वह एक जीवन बन गई.

कॉलेज की पढाई के दौरान करीब तीन साल तक राजू हिरानी ड्रामा खेलते रहे. स्क्रिप्ट लिखने से लेकर एक्टिंग और डायरेक्शन तक स्टेज पर नाटक की हर विद्या में उन्होंने खूब हाथ आजमाएं. ड्रामे का ये शौक देखते ही देखते जुनून में तब्दील हो गया. इसीलिए राजू का ज्यादातर वक्त अब ऐसे दोस्तों के बीच गुजरने लगा जो अभिनय के क्षेत्र में कुछ कर गुजरना चाहते थे. राजू हिरानी दिन में अपने पिता के टाइपिंग इंस्टीट्यूट में बैठते थे लेकिन सूरज ढलते ही ड्रामें की रिहर्सल करने ऑडीटोरियम में पहुंच जाया करते थे. राजू हिरानी के स्कूल के दिनों के दोस्त देबाशीष नाहा बताते हैं कि उनके सिर पर एक्टिंग का जुनून किस कदर सवार था.

 

राजू हिरानी के दोस्त डॉ देबाशीष नाहा बताते हैं कि मैं मेडिकल कॉलेज में पढ़ता था और राजू हिल्सक्लब कॉलेज में पढ़ता था. मैं सदर में रहता था राजू छावनी में रहते थे तो हम लोगों का एक थियेटर ग्रुप था जिसका नाम था आवाज. उसमे कई दोस्त थे हम लोग स्टेज प्ले किया करते थे. रेडियो प्लेस किया करते थे. क्योंकि हमलोग स्टूडेंटस थे तो रिहलसल कहां करनी है ये थोड़ी प्रोबलम हुआ करती थी. तो बहुत बार हम राजू के घर में उनकी छत पर रिहर्सल किया करते थे. या फिर मैं उस समय मेडिकल कॉलेज की स्टूडेंटस यूनियन की कल्चर कमेटी का चेयरमेन था तो हम जो वहां ऑडिटोरियम है उसको यूज किया करते थे, चोरी छुपे शाम को रात को जब क्लास खत्म हो जाएं, तब गार्ड को थोड़ा सा पटाके हम वहां रिहर्सल किया करते.

 

राजू हिरानी के दोस्त संजय अरोरा बताते हैं कि वह भी सामान्य विद्यार्थी था. जब वह ड्रामा ग्रुप से जुड़ा उसके बाद जो तरक्की हुई. उसके पिता और चाचा चाहते थे कि वह चार्टेड अकाउंटेंट बने या टैक्स कन्सल्टेंट. लॉ कालेज में एडमिशन भी लिया उसने पर उसका दिल वहां था नही.

 

नागपुर के विजय नगर छावनी इलाके में राजू का बचपन गुजरा है. उनके ज्यादातर दोस्त आज भी उनके घर के आस-पास इसी मोहल्ले में रहते हैं. मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले राजू के पिता नागपुर में ही एक छोटा सा टाइपिंग इंस्टीट्यूट चलाया करते थे. ये वह दौर था. जब देश में टाइपराइटर की भारी मांग हुआ करती थी. कॉलेज के दिनों में राजू हिरानी भी अपने पिता के साथ टाइपराइटर बेचा करते थे. उन्होंने कैल्कुलेटर सुधारने का काम भी सीख रखा था. लेकिन टाइपराइटिंग के इस छोटे से धंधे को जमाने के लिए राजू के पिता सुरेश हिरानी को खूब पापड़ बेलने पड़े थे. और यही वजह थी कि वह अपने बेटे के सपने पर अपने उस संघर्ष का साया तक नहीं पड़ने देना चाहते थे जो उन्होनें देश के विभाजन के दौरान झेला था.

 

बॉलीवुड के सबसे कामयाब निर्देशक बन चुके राजू हिरानी के खानदान की ये दास्तान उस दौर में शुरु होती है जब देश अंग्रेजों का गुलाम था. पाकिस्तान के सिंध प्रांत में नवाबशाह नाम के इलाके में राजू के पिता सुरेश हिरानी का जन्म हुआ था. राजू हिरानी बताते है कि उनके पुरखे सिंध के दरिया-खानमरी गांव के जमींदार थे. उनके पुरखों का भरा – पूरा परिवार था और शानों शौकत की जिंदगी भी. लेकिन जब देश आजाद हुआ तो विस्थापित हुए हजारों परिवारों की तरह राजू हिरानी का परिवार भी शरणार्थी बन चुका था. 14 साल की उम्र में राजू के पिता को परिवार के साथ पलायन का दंश भी भोगना पड़ा था. 1947 में जब पाकिस्तान बना तो राजू के पिता अपने दूसरे रिश्तेदारों के साथ नवाबशाह से आगरा आ गए थे. लेकिन रोजगार की तलाश ने हिरानी परिवार को एक दूसरे शहर फिरोजाबाद तक पहुंचा दिया.

 

उत्तर प्रदेश का शहर फिरोजाबाद कांच की चूड़ियों के लिए मशहूर रहा है और यहीं राजू हिरानी के पिता सुरेश हिरानी कई सालों तक चूड़ी बनाने की फैक्ट्री में काम करते रहे. राजू हिरानी बताते हैं कि आगरा में एक रिफ्यूजी कैंप था वहां कुछ वक्त रहे फिर फिरोजाबाद में चूड़ियों की फैक्ट्री में कई साल तक काम किया. वास्तव में अभी तक वह हमें चूड़ियां बनाने का तरिका बताते थे. कई साल वहां काम किया, फिर मुझे बताते है कि आईसक्रीम बेची साईकिल पर रख कर उन्होंने कई साल. फिर उनकी एक सिस्टर थी नागपुर में . तो उन्होंने कहा यहां आ जाओ तो फिर वह नागपुर चले गए. और एक जनरल स्टोर में उन्होंने काम करना शुरु किया. तो मुझे लगता है उनका माइंड शुरु से प्रोग्रेसिव था सुबह काम करते थे शाम को नाइट स्कूल जाकर पढ़ते थे. फैमिली को भी देखा करते थे.

 

1955 का ये वह दौर था जब देश में टाइप-राइटर काफी तेजी से फैलने लगे थे. उस वक्त लोगों के लिए टाइपराइटर एक नई चीज थे ठीक उसी तरह जैसे आज के दौर में कंप्यूटर है. राजू हिरानी बताते है कि उनके पिता ने कर्ज लेकर दो टाइपराइटर खरीदे थे जिनसे वह लोगों को टाइपिंग सिखाया करते थे. और इस तरह उन्होंने अपने टाइपिंग इंस्टीट्यूट की शुरुआत की थी जिसका नाम राजकुमार टाइपिंग इंस्टीट्यूट रखा गया था.

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी ने बताया कि नागपुर में लोग मुझसे कहा करते थे कि यार तुम्हारे नाम पर डैड ने व्यापार चालू किया. तो मै कहता था नहीं मै व्यापार के नाम पर था क्योकि जब मैं पैदा हुआ तो इन्होंने कहा इसका नाम राजकुमार रख दो. तो उसके बाद वह टाइप राइटर से औऱ टाइप राइटर बेचने लगे कैलकुलेटर बेचते थे. 

 

जिंदगी में संघर्ष का बेहद बुरा दौर देखने वाले सुरेश हिरानी ने एक –एक पैसा जोड़कर अपना छोटा सा टाइपिंग का कारोबार जमाया था. यही वजह थी कि वह अपने बेटे राजू को पढ़ा लिखा कर डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन बेटे का सिनेमा में काम करने का सपना जब उनके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया तो उन्होंने अपनी ख्वाहिश का गला घोंट दिया.

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि थ्री इडियट्स में एक सीन है जहां माधवन अपने पिताजी के पास जाते है और कहते है मुझे इंजीनियर नहीं बनना वह सीन मेरी लाइफ में एकदम वैसे ही हुआ था. क्योकि मैं इंजीनियर नहीं बन पाया तो चाचा जी वकील थे उन्होंने कहा तुम चार्टेड अकाउंट बन जाओ ये नया प्रोफेशन है और काफी लोग कर रहे है. तो मैंने उसकी फाउंडेशन क्ला अटैंड की और मुझे याद है फाउंडेशन कोर्स का पहला इंट्रेंस एक्जाम था तब मेरा बिल्कुल मन नहीं किया. मैने कहा मुझे मजा नही आता, मुझे समझ नहीं आता अकाउंट्स-वकाउंट्स तो मुझे नहीं करना है अब मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि किससे जाकर कहूं. मुझे डर ये था कि कही पिताजी से जाकर कहूंगा तो वह कहेंगे यार पहले इंजीनियरिंग नहीं हुई चार्टेड अकाउंटैंसी भी नहीं करनी है तो तुम करना क्या चाहते हो. पर मुझे बिल्कुल मजा नहीं आ रहा था कि मुझे ये करना ही नही है.

 

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि उस वक्तत डैड को लगता था कि शायद यार ये एक्टर बनना चाहता है. तो मैं आया बॉम्बे तो उस वक्त प्राइवेट कोर्सेस हुआ करते थे याद नहीं है कौन उन कोर्स को कन्डक्ट किया करता था बहुत छोटे-2 हुआ करते थे. उसके बड़े एडस आया करते थे फुल पेज पर 3 महीने का कोर्स है 6 महीने का कोर्स है तो मैं मुंबई ट्रेन पकड़कर पहुंचा और मुझे याद है वह बुलाते थे कि आपका इंटरव्यू होगा ऑडिशन होगा. तो मैं वहां गया इंटरव्यू दिया ऑडिशन दिया बहुत लंबी लाइन लगी थी. फिर वह कहते थे कि शाम को आपका रिजल्ट अनाउंस होगा तो हम शाम तक बैठे रहते थे, सारे लोग बैठे हुए थे और जो भी आया था सबको सेलेक्ट कर लिया था क्योंकि उनका तो व्यापार था. तो मुझे लगा कि यह मामला ठीक नहीं है यहां कोई एक्टिंग सीख नहीं पाएगा और कुछ नहीं हो पाएगा तो मैं वापस आ गया.

 

एक्टिंग की हरसत दिल में लिए जब राजू हिरानी मुंबई से घर वापस लौटे उस वक्त उनके कई दोस्त नागपुर मेडिकल कॉलेज में पढाई कर रहे थे यही वजह थी कि मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में राजू हिरानी का आना-जाना भी लगा रहता था. उन दिनों डॉक्टरी की पढाई कर रहे राजू के दोस्त बताते है कि कॉलेज के उन दिनों में ही उनके दिमाग में वह आइडियाज भी पनपते थे जिसे बाद में उन्होनें फिल्मी परदे पर खूबसूरती के साथ उतारा हैं.

 

राजू हिरानी के दोस्त डॉ देबाशीष नाहा ने बताया कि कॉलेज के बाद शाम को 7 के बाद हम लोग रिहर्सल किया करते थे तो वह रिहर्सल 7 से 9.30 तक होता था औऱ मुझे भी एक रुम मिला था वहां पर तो हम लोग बहुत टाइम स्पेन्ड किया करते थे. औऱ अब जब मेरा क्लास कही चल रहा है तो अलाटिमी का म्युजियम है कुछ इंटरेस्टिंग दिख गया तो थोड़ी देर वहां टाइम पास करके जो शायद नॉरमल इंसान वहां न जा पाएं वहां हम लोग चले जाया करते थे. और स्टोरी सुनकर की रैगिंग किस तरह होता है तो इन सब चीजो से थोड़े बहुत आइडिया हम लोगों को था.

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि नागपुर में मेरे काफी दोस्त थे जो मेडिकल में चले गए. तो मैं उनके हॉस्टल में चला जाया करता था. उनके साथ रहता था तो वहां मैने बहुत मजेदार चीजें देखी अजीबो गरीब. एक स्टूडेंट सिगरेट पीता था और स्कल जैसे ऐशट्रे था तो मैने पूछा अरे वाह कितना अच्छा है. मैने कभी ऐसा स्कल की शेप मे एसट्रे नहीं देखा. तो उसने कहा रियल का स्कल है. तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि जिसमें ये सिगरेट बुझा रहा है वह कुछ साल पहले किसी का सर था. फिर एक दिन पोस्टमार्टम दिखाया उन्होंने तो मुझे बड़ा फैसिनेट वर्ल्ड लगा, मुझे हसी भी आ रही थी औऱ ऐसी-2 चीजें हो रही थी लोग कॉरीडोर में सो रहे है उनके साथ रोना भी आ रहा था. चूंकि मैं प्ले करता था तो एक आदत थी डायरी में नोट करने की. तो मेडिकल कॉलेज से जुड़ी बहुत सारी चीजे मैने नोट की.

 

राजू हिरानी लाख कोशिशों के बावजूद खुद तो डॉक्टर नहीं बना सके लेकिन दोस्तों के साथ उनका ज्यादातर वक्त मेडिकल कॉलेज में ही गुजरने लगा था. उधर मुंबई से बैरंग लौटने के बाद से राजू का करियर भी अधर में लटका हुआ था. उन्हें अपनी मंजिल तो मालूम थी लेकिन वहां तक पहुंचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा था ऐसे में एक बार फिर राजू हिरानी को उनके पिता सुरेश हीरानी ने ही दिखाई एक नई राह. 

 

फिल्म निर्देशक राजू हिरानी बताते हैं कि उन्होंने मुझे मोटिवेट किया. वास्तव में उन्होंने मुझसे कहा कि फिल्म इन्सटीट्यूट नाम कि एक जगह है. अगर सिनेमा सिखना चाहते हो तो वहां जाकर सिखो. मैने वहां अप्लाई किया और डायरेक्शन में अप्लाई किया मगर एडिमिशन नहीं हुआ फिर मुझसे किसी ने कहा कि यहां लाखो लोग अप्लाई करते है और हर कोर्स की 8 सीट हुआ करती थी टोटल 32 सीट्स हुआ करता थी 4 कोर्स की. तो किसी ने कहा एडिटिंग में अप्लाई करो उसमे कम लोग करते है तो मैने कहा ये होती क्या है, उन्होंने कहा क्या करना है तुम्हे एक बार एडमिशन ले लो चले जाना, औऱ फिर डायरेक्शन कर लेना. तो मैने एडिटिंग में अप्लाई किया औऱ अगले साल मेरा एडमिशन हो गया.

 

नागपुर में पिता के टाइपिंग इंस्टीट्यूट से निकल कर राजू अब पुणे के इस फिल्म इंस्टीट्यूट तक पहुंच चुके थे. भारतीय फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान में दाखिला लेने के बाद उनके सिर से एक्टिंग का फितूर भी उतर चुका था. राजू अब बॉलीवुड में फिल्में बनाना चाहते थे लेकिन आगे उनकी ये राह इतनी आसान भी नहीं थी. बॉलीवुड की सतरंगी दुनिया में संघर्ष की चुभन उनके इंतजार में थी. पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में तीन साल पढाई करने के बाद जब राजू हिरानी आगे सफर के लिए तैयार हुए तो जैसे उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई थी.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि हमारा एक वीडियो कोर्स होने वाला था उस वक्त वीडियो शुरु हुआ था. तो उन्होंने कहा था कि कोर्स खत्म होने पर 1 महीने का वीडियो कोर्स देंगे. ताकि आप वीडियो में भी काम कर सके. जब मैं कैंपल में घुसा तो काफी खाली-2 था, छात्र ही नहीं दिख रहे थे मैं अपने कमरे पर गया वहां ताला बदल गया था मेरी चाबी नहीं लग रही थी. तो मैने कहा हो क्या गया? तो उन्होंने कहा कोर्स खत्म हो गया सब लोग चले गए. तो मैने कहा वीडियो कोर्स? तो कहता वह तो स्क्रैप हो गया, आपको चिठ्ठी नही मिली. मैंने कहा नहीं मुझे तो कोई चिठ्ठी नहीं मिली. मुझे गुस्सा आया कोर्स स्क्रैप हो गया है, मैं यहां खड़ा हूं जहां मै 3 साल रहा हूं. मेरा कोई दोस्त नहीं है कुछ नहीं है. मैं बैठा रहा पेड़ के नीचे पूरा दिन सोचता रहा कि करना क्या है. तो 2 चारे थे या तो नागपुर चले जाओ वापस या फिर बाम्बे चले जाओ. तो मैने कुछ सामान पैक किया कुछ छोड़ा, एक बैग लेकर 11-11.30 पर बस ली और मैं बॉम्बे आ गया.

 

कहते हैं मुंबई सपनों का शहर है. ना जाने कितने सपने रोज मुंबई के दरवाजे पर दस्तक देते हैं. हर रोज सैकड़ों – हजारों लोग सुनहरे भविष्य की तलाश में मुंबई के रेलवे स्टेशन पर उतरते हैं. नागपुर के नौजवान राजू ने भी जब फिल्म डायरेक्टर बनने के सपने के साथ मुंबई में कदम रखे तो उसके सामने खड़ा था हकीकत का वह साया जिसने उसके सुनहरे सपनों को एक बारगी झकझोर के रख दिया था.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि बॉम्बे में एक दोस्त था श्री राम राघवन उसका घर था गोरेगांव में, तो मैं उसके घर पहुंचा सुबह 4 या 5 बजे. तो उसका 2 कमरे का घर था तो 1कमरे में वह खुद रहता था 1में मुझे घुसा दिया, वहां पर 3 लोग हमारे बैच के पहले सोए हुए थे. मैने भी चादर ली औऱ सो गया, सोच रहा हूं कि कल से क्या करना है. 5 बजे आया था सोया था आधी नींद में था 7 बजे क्वाइन्स कि आवाज आने लगी. उठ के देखा तो सारे बैठे हुए थे, इसके घर फोन नहीं था तो नीचे एक पीसीओ था. और सबके हाथ में एक फिल्म डायरी थी जिसमे सबके नाम होते थे डायरेक्टर, प्रोड्यूसर,एक्टर, साउंड रिकार्डिस्ट, एडिटर्स तो जिस ब्रांच का था वह फोन करता था. मुझे ऐसा झटका लगा कि यार ये क्या हो रहा है.

 

मुंबई में अगले दिन राजू हिरानी के हाथ में भी वैसी ही डायरी मौजूद थी जिसमें बॉलीवुड के तमाम डायरेक्टर और प्रोड्यूसरों के नंबर मौजूद थे. रोज सुबह फोन में क्वाइन डालना और लोगों से काम मांगना राजू की जिंदगी का एक हिस्सा सा बन गया था. एक फिल्म स्टूडियों से लेकर दूसरे स्टूडियों तक काम की तलाश में भटकते हुए राजू के दिन एक एक कर गुजरने लगे. दिन महीनों में बदले और महीने साल में तब्दील हो गए लेकिन जब कही ढंग का काम नहीं मिला तो थक हार के राजू हिरानी ने एक एडिटिंग स्टूडियों में नौकरी कर ली. और इस तरह मुंबई के हालात ने फिल्म डायरेक्टर की बजाए उन्हें बना दिया एक एडिटर.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि वहां एक एकता नाम का एडिटिंग हुआ करता था. उस टाइम सीरिएल बहुत एडिट हुआ करते थे, लोबैंड की मशीन होती थी, हर स्टूडियो  में एक एडिटर हुआ करता था . फ्रीलांस एडिटर आते थे मगर हर स्टूडिओ एक एडिटर रखता था कि अगर कोई आदमी बिना एडिटर के आता है तो वह एक रख सकता है, तो आपका काम होता था बुकिंग लो खाना वाना ऑर्डर कर दो. तो वहां काम शुरु किया तो वहां काफी लोग आते थे तो उनके साथ बैठकर एडिट करता था,फिर जब लोगो के साथ काम किया तो वह हरदम बुलाने लगे.  वहां मैने 6 महीने काम किया फिर मुझे बहुत जल्दी काम मिलने लगा. उसके बाद 5 साल तक खूब एडिटिंग की टीवी सीरिएल भी किए. डाक्यूमेंट्री भी की एड भी की वीडियो जो मिलता था एडिट करता जाता था.

 

कहते है कि मायानगरी मुंबई यहां किस्मत आजमाने वालों को फुटपाथ से उठाकर सीधे फाइव स्टार तक पहुंचाती रही है लेकिन कई सालों के संघर्ष के बाद भी जब मुंबई में राजू हिरानी के पैर नहीं जमें तो इस दौरान उन्होंने एक बार फिर अपने शहर नागपुर का भी रुख किया. विज्ञापन एजेंसी चलाने वाले राजू के बचपन के दोस्त संजय अरोरा को आज भी अच्छी तरह याद है कि किस तरह घूस देकर राजू हिरानी ने महज तीन हजार रुपये में अपनी जिंदगी की पहली विज्ञापन फिल्म बनाई थी.

 

राजू हिरानी के दोस्त संजय अरोरा बताते हैं कि उस समय नागपुर में एक ड्रिंक लॉन्च हुआ था किम्पो नाम का औऱ हमें कहा गया कि इसके लिए एक फिल्म बनाइए औऱ 3 हजार रु का बजट था. उस समय. तो राजू को मैने कहा कि ऐसे-2 प्रोजेक्ट मिला है. तो वह जस्ट आया था तो एक्साइटेड था फिल्म बनाने के बारे में तो उसने कहा ठीक है हम फिल्म बनाते है तो उसने एक वीडियो कैमरा हाइयर किया. सुबह 5.30-6 बजे हम लोग सैमनरी हील्स नागपुर में जो है वहां गए औऱ जो टॉय ट्रेन के ट्रैक्स है जो जंगल से गुजरते है वहां पर हमने शूट किया. फिर ये पूरा शूट लेकर वह बॉम्बे गया. उसने बॉम्बे के एक स्टूडियो क्योंकि पैसे तो थे नहीं 3 हजार में पूरा शूट करना था. तो उसने स्टूडियो के चपरासी को ब्राइब किया और साउंड का एडिटिंग मिक्सिंग उसने ब्राइब करके ऑवरनाईट किया रात में खुलवाके स्पेसली.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि नागपुर में एक न्यूज पेपर हुआ करता था हितवाद अंग्रेजी. अभी भी है. तो उसने कहा एक कॉर्पोरेट फिल्म बना. मैने कहा बनाऊंगा. उसने कहा 40,000 रु मिलेंगे, मैने कहा बनाऊगा. तो स्क्रिप्ट  लिखते थे सारे दोस्त अपने थे तो कहा बस इतने ही पैसे है. इक्विप्मेंट हायर कर लिए थे. तो जैसे तैसे 40,000 में भी हम फिल्म बना लेते थे तो ऐसा काम मैने बहुत किया है. लोगों को लगा कि ये कुछ कर सकता है तो उन्होने छोटी-2 एड फिल्म देनी शुरु की. तो मैने कैनवस फिल्म नाम से एक प्रोडक्शन कंपनी  बनाई औऱ मैने बहुत सारी विज्ञापन बनाई. ऐसा नहीं था कि मैं डायरेक्शन नहीं कर रहा था. और स्क्रिप्ट लिखते रहता था.

 

एडवर्टाइजिंग और वीडियो एडिटिंग के बूते राजू हिरानी ने बॉलीवुड में अपनी राह बनानी शुरु कर दी थी. इसी दौरान उन्होंने कुछ फीचर फिल्में भी की जो आधी अधूरी ही डिब्बा बंद हो गई. साल गुजरते रहे और राजू की कलम से निकल कर वह अहसास आइडिए की शक्ल में कागज पर उतरते रहे जिन्हें उन्होनें मेडिकल कॉलेज के माहौल में महसूस किया था. लेकिन बॉलीवुड में राजू का सितारा उस वक्त चमका जब उन्हें फिल्म प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म मिशन कश्मीर एडिट करने का मौका दिया.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि नागपुर से ही मैं मुन्नाभाई MBBS लिख रहा था. क्योंकि मेरे बहुत सारे दोस्त नागपुर मेडिकल में थे. मगर मुझे ये समझ नहीं आता था कि किसे दिखाऊंगा कोई क्यों मेरे साथ फिल्म बनाएगा. एक ही तरीका है कि अगर मैं किसी के पास बहुत अच्छा स्क्रिप्ट लेकर जाऊं तो ही कोई मेरे साथ फिल्म बनाएगा. क्योंकि मुझसे ये नहीं होता कि उनके पीछे घुमों यारी दोस्ती करु क्योकिं मै ये नहीं कर सकता था. मैं लिख रहा था सालों से लेकिन मुझे लिखने का मोटिवेशन मिशन कश्मीर से मिला. मुझे बहुत मजा आया उसे एडिट करने में फिर मे एक ब्रेक लिया काम से जो भी मैं कर रहा था. मैने कहा 8 महीने मैं कुछ नहीं करुंगा बस स्क्रिप्ट लिखूंगा.

 

बॉलीवुड के उन दिनों को याद कर राजू हिरानी बताते है कि करीब एक साल तक वह फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस की स्क्रिप्ट लिखते रहे थे और जब स्क्रिप्ट तैयार हुईं तो उनकी नजर में मुन्नाभाई के रोल के लिए पहली पसंद अनिल कपूर थे. इस रोल के लिए बात बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान से भी चली थी. लेकिन मुन्नाभाई की खोज करते करते जब दो साल गुजर गए तो फिल्म के प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा ने राजू को सुझाया संजय दत्त का नाम.

 

राजू हिरानी ने बताया कि मैने सोचा संजय दत्त. तो मुझे बड़ा अजीब लगा कि मेरी फिल्म तो शाहरुख खान कर रहा था अब ये. पर कुछ रास्ता नहीं दिख रहा था तो मैंने संजय दत्त की फिल्म देखनी शुरु की. मैंने सोचा देखूं कैसा लगता है फिर मैंने वास्तव देखी तो वास्तव में मुझे उसका परफॉर्मेंस बहुत अच्छा लगा. क्योंकि मेरे रोल से मैच होता था. फिर मैने चेकलिस्ट बनाई 81 सीन थे फिल्म में और बाजू में सब एक्टर के नाम लिखे और मैं आंख बंद करके सीन के बारे में सोचता था कि ये एक्टर कैसा करेगा तो मैं थिंक करता जाता था. और फिर जब मैंने देखा था संजू बेहतरीन कर रहे थे. मुझे लगा ये है मुन्नाभाई है . इसके आगे औऱ पीछे क्या है. इसकी शक्ल है बॉडी है भाई जैसे, इसकी आंखो से ये एक गोल्डन हर्टेड भाई लगता है. जो मुन्नाभाई है जो टफ भी है औऱ अन्दर से सॉफ्ट भी है.

 

फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस नागपुर के इसी मेडिकल कॉलेज से निकली है. राजू हिरानी बताते है कि मेडिकल कॉलेज के माहौल में अपने दोस्तों के बीच उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया उसी को अपनी फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस के किरदार में ढाल दिया. मेडिकल की दुनिया में होने वाली कमीशनखोरी और मरीजों से धोखेबाजी की घटनाओं को राजू हिरानी ने बरसों अपने जहन में सहेजे रखा. पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में जब राजू पढाई कर रहे थे उसी दौरान उन्होनें फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस की स्क्रिप्ट लिखनी भी शुरु कर दी थी और उनके लेखन का ये सिलसिला उनके मुंबई आने के बाद भी सालों तक चलता रहा. लेकिन उन्हें अपनी बरसों की इस मेहनत का सिला तब मिला जब 2003 में आई फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि मेरे दोस्त डॉक्टर बन चुके थे तो मैंने देखना शुरु किया कि मेडिकल फील्ड में वह कैसे भेजते है पैथालॉजिस्ट के पास कैसे कमीशन भेजते हैं और मैलप्रेक्टीसिस. तो काफी कुछ चीजें दिखाई देने लगी. तो मैंने बहुत हार्ड हैटिंग स्क्रिप्ट लिखी . जो भाई किस्म का आदमी है तो फिल्म शुरु हुई कि उसके सर में दर्द होता है और वह जाता है डॉक्टर के पास डॉक्टर उसे चेक करता है औऱ पैथॉलॉजी टेस्ट के लिए भेज देता है. वहां से रिपोर्ट आती है कि ये ठीक नहीं है वह ठीक नहीं है और उसे भेज देता है कॉफ्टोमोलॉजिक के पास आंख चेक करवाने के लिए. वह बेचारा दिन भर घूमता रहता है अगले दिन उसका सर दर्द अपने आप ठीक हो जाता है पता चलता है हैंग ऑवर था दारु ज्यादा पी ली है. तो उसे एहसास होता है कि मेरे हैंगऑवर से इन लोगों ने कितने पैसे कमा लिए. मगर वह बड़ा हार्ड हैटिंग स्टायर था. फिर कुछ दोस्तों को सुनाया फिर मुझे ऐसा लगा कि मैं ज्यादा ब्रूटल हो रहा हूं डॉक्टर की तरफ, ऐसा नहीं है कि सारे डॉक्टर ऐसे हैं बहुत से डॉक्टर अच्छे भी होते हैं. जिनको मैं जानता हूं. तो वह स्क्रिप्ट बदलते-2 उसने ये शेप लिया कि अंडरवर्ल्ड डॉन बजाय वह डॉन ही रहा लेकिन मेडिकल कॉलेज में जाने का उसका मकसद बदल गया अब वह इसलिए जाना चाहता है क्योंकि उसका पिता की बेइज्जती हुई.

 

निर्देशक के तौर पर मुन्नाभाई एमबीबीएस राजू हिरानी की पहली फिल्म थी. इस फिल्म के तीन साल बाद राजू हिरानी ने फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई का निर्देशन भी किया. और उनकी इस फिल्म में भी मुन्नाभाई की गांधीगिरी ने जैसे दर्शकों के दिलों पर जादू कर दिया. दरअसल राजू हिरानी की फिल्मों की ये खासियत रही है कि उनके किरदार मिडिल क्लास हीरो होते है और फिल्म के सीन रोजमर्रा की जिंदगी की कहानी बयान करते नजर आते हैं यही वजह है कि उनकी सारी फिल्में दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब रही है.

 

राजू हिरानी बताते हैं कि लगे रहो में एक सीन था जो लड़की मुन्ना को फोन करके कहती है मेरे डैड मुझे एक लड़के से मिला रहे हैं. तो मै कैसे डिसाइड करुं कि वह मेरे लिए ठीक है. अब ये सीन बना तो इस सीन के बेसिस यहां से मिले कि मैं जब भी अपने दोस्त के साथ होटल जाता था तो वे वेटर को शी शी करके बुलाता था तो मुझे बड़ा अजीब लगता था कि ये एसे क्यों बुलाता है. तो इस तरह से लाइफ के सीन से फिल्मों के सीन बन जाते हैं.

 

 

राजू हिरानी के दोस्त डॉ. देबाशीष नाहा ने बताया कि ये रैगिंग वाला जो कॉन्सेप्ट है यह सिर्फ मुन्नाभाई में ही नहीं 3 इडियट में भी डाला गया है. 3 इडियट में जो डाला गया है अब मैं मेनशन करता हूं कि वह जो यूरीन करते है औऱ वह जो इलेक्ट्रानिक कनेक्शन लगा रहता है ये सब इंजीनियर औऱ मेडिकल कॉलेज में बहुत कॉमन चीजें है तो ये सब आइडिया वहां से आए हैं. फिर ये आप को याद होगा कि ‘मैं पढ़ रहा हूं ये अलग बात है लेकिन बाकी लोगों को पढ़ना नहीं चाहिए’ तो ये है न हर किसी की रुम में उस समय बुक्स हुआ करती थी, वह लोग वह किताब पढ़ें ताकि उनका ध्यान डिस्ट्रैक्ट हो जाए और हम पढाई करें.

 

फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में डॉक्टर का किरदार निभा चुके राजू हिरानी के दोस्त देबाशीष नाहा बताते है कि फिल्म बनाते वक्त राजू हिरानी सबसे ज्यादा स्क्रिप्ट पर ही ध्यान देते हैं. यही वजह है कि उनकी फिल्में लंबे अंतराल के बाद परदे पर नजर आई हैं. मुन्नाभाई, लगे रहो मुन्नाभाई, थ्री इडीयट, पीके और पिछले बारह सालो में राजू हिरानी ने सिर्फ चार फिल्मों का ही निर्देशन किया है. राजू की एक खूबी ये भी है कि वह अपनी फिल्मों के किरदार रीयल लाइफ से उठाते हैं और इस बात का भी खास ख्याल रखते हैं कि फिल्म में हर कलाकार अपने किरदार में सौ फीसदी फिट बैठ सके. आम जिंदगी से जुड़े किरदारों को फिल्म के सांचे में ढालने वाले राजू हिरानी की कामयाबी का एक राज ये भी है. कि वह टाइपिंग इंस्टीट्यूट का अपना वह सबक आज भी नहीं भूले हैं कि कामयाबी के पीछे मत भागो, काबिल बनो, कामयाबी खुद पीछे आएगी.

First Published: Saturday, 20 December 2014 3:46 PM

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